असली हितैषी
सूरज पुर गांव में पूरणमल नाम का एक सेठ रहता था। उसके पास दो बैल थे। वह उन्हें बहुत प्यार करता था। वे भी उसके काम के लिए हमेशा तैयार रहते। वह अक्सर अपनी गाड़ी में उन्हें जोत कर सामान लादकर इधर उधर जाता। एक बार पास के गांव में मेला लगा। सेठ जी ने वहां माल ले जाकर बेचने पर विचार किया। जब मेले का दिन आया तो सेठ अपनी गाड़ी में सामान लाद कर दो नौकरों को साथ लेकर उस गांव के लिए निकल पड़ा। जब वह रास्ते में किशन गढ़ गांव के समीप पहुंचा तो वहां पानी का सरोवर देख कर उसने विचार किया कि यहां रुक कर कुछ देर सुस्ता लिया जाए। सरोवर में बैल पानी पी लेंगे और वहां पर हरी हरी घास चर कर अपनी भूख मिटा लेंगे। मन में यह विचार आते ही उसने एक अच्छी जगह देख कर गाड़ी रोक दी। नौकरों ने बैल खोल दिए। वहीँ पर उसने आराम करने के लिए चद्दर बिछा दी। पहले कुछ देर सुस्ताने के बाद उसने भोजन किया। नौकरो ने भी भोजन किया।
दोनों बैल सरोवर के आसपास घूम घूम कर हरी हरी घास का आनंद उठाने लगे। एक बैल चरते चरते कुछ आगे निकल गया। एक पेड़ की छांव में वह कुछ देर खड़ा होकर सुस्ताने लगा। फिर उसने जैसे ही पानी पीने के लिए कदम बढ़ाया उसका पैर वहां दल दल में धंस गया। वह निकलने की जितनी कोशिश करता उतना ही धंसता जाता।
जब यह बात सेठ जी को पता चली तो वह दोनों नौकरों को साथ लेकर उस ओर दौड़ पड़े । तीनों ने मिलकर बैल को निकालने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। इस से सेठ बड़ा दुखी था। दूसरी तरफ सेठ जी को मेले में जाने की फ़िक्र सताने लगी। शाम हो चली थी। घंटों के प्रयास के बावजूद जब बैल उस दलदल से बाहर नहीं निकला, तो सेठ जी सोच में पड़ गए। उन्हें कीमती बैल के खोने का गम सताने लगा। जब उनके सारे प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने बैल को उसकी किस्मत पर छोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला किया।
बैल को वहां फंसे दो दिन हो गए थे। भूख से निढाल वह अधमरा हो गया था। तभी उधर से एक गडरिया अपनी बकरियां चराते हुए निकला। उसने जब बैल को इस हालत में देखा तो उसे इस पर बहुत तरस आया। वह सोच ने लगा की ऐसा कौन निष्ठुर व्यक्ति है जो इस बेचारे को इस हालत में
मरता छोड़ कर चला गया है।
गडरिये को रह रह कर उस पर तरस आ रहा था। बैल को मरता देख उस पेड़ पर चील और गिद्ध आकर जमा हो गए। कौए चारों तरफ मंडराने लगे। बैल को लगा कि अब उसकी मौत निश्चित है , वह ईश्वर को याद करने लगा। गडरिये ने जब वहां पक्षियों को मंडराते देखा तो वह मन ही मन बुदबुदाया कि ये पक्षी इसे नोंच नोंच कर जीतेजी मार डालेंगे। तब उसने उसे बचाने की सोची, पर बचाया कैसे जाए उस की समझ में नहीं आ रहा था।
उसके मन में एक विचार कौंधा। उसने अपने चारों तरफ नजर दौड़ाई, फिर वह उस तरफ बढ़ गया जिधर कुछ बेलें लटकी हुई थीं। उसने एक मजबूत बेल तोड़ी। उसे उसने मरोड़ कर एक मजबूत रस्सी बनाई, फिर उसको बैल के चारों तरफ बांध दिया और दूसरा सिरा पेड़ की एक मजबूत डाल पर गिरा दिया। उस सिरे पर बड़े बड़े पत्थर ला कर बांध दिए। अब उसने जोर लगा कर उसे खींचना शुरू किया। थोड़ी कोशिश के बाद बैल अपनी जगह से हिलने लगा। गडरिया अब पहले से ज्यादा कोशिश करने लगा। आख़िरकार उसने बैल को उस दलदल से बाहर निकाल लिया। बैल ने उठने की कोशिश की तो वह वहीँ लुढ़क गया। गडरिया समझ गया कि वह कमजोरी के कारण लुढ़क गया है। काफी देर तक वह उसे सहलाता रहा, फिर वह उसके लिए हरी हरी घास लेकर आया। बैल भूखा तो था ही। उसने धीरे धीरे घास खानी शुरू की। इस के बाद गडरिया बकरियां लेकर अपने घर चला गया।
अगले दिन वह सुबह जल्दी वहां आ गया। उसने देखा कि बैल उठकर घास चर रहा है। जैसे ही बैल ने गडरिए को देखा तो वह पूंछ हिलाता हुआ उसकी ओर बढ़ा। गडरिया उसको काफी देर तक सहलाता रहा। अब बैल पूरी तरह स्वस्थ हो गया था।
एक सप्ताह बाद सेठ जी वापस लौटे। उन्हेँ उम्मीद थी कि बैल मर चुका होगा। वह उस तालाब के पास पहुंचे, लेकिन वहां बैल को न पाकर वह हैरान हो गए। तभी उन्हें सामने से बैल आता हुआ दिखाई दिया। उसे देख कर सेठ जी की बांछें खिल उठीं।
उन्होंने नौकरों को उसे ले चलने को कहा तो बैल बोला, ' मैं आपके साथ नहीं जाऊंगा, यहीं रह कर बाकी जिंदगी बिताऊंगा।'
उसकी यह बात सुनकर सेठ जी चौंके, फिर बोले ,' मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूं।
आपकी बात सही है , पर आपका प्यार स्वार्थ भरा है। मैं आपका काम करता था तो आप मुझे प्यार करते थे । लेकिन संकट के समय आप दौलत के लालच में मुझे मरने के लिए अकेला छोड़ कर चलते बने। दूसरी तरफ उस गडरिए की मानवता देखिए जिसने बिना स्वार्थ के मेरी जान बचाई।
सुख के समय तो सभी प्यार करते हैं। पर जो संकट के समय काम आता है वही असली हितैषी होता है । इसलिए मैंने निर्णय किया है कि मैं गडरिए की सेवा करके अपना बाकी जीवन बिताऊंगा। यह कह कर बैल पास के जंगल में चला गया।
-विनोद हर्ष
सूरज पुर गांव में पूरणमल नाम का एक सेठ रहता था। उसके पास दो बैल थे। वह उन्हें बहुत प्यार करता था। वे भी उसके काम के लिए हमेशा तैयार रहते। वह अक्सर अपनी गाड़ी में उन्हें जोत कर सामान लादकर इधर उधर जाता। एक बार पास के गांव में मेला लगा। सेठ जी ने वहां माल ले जाकर बेचने पर विचार किया। जब मेले का दिन आया तो सेठ अपनी गाड़ी में सामान लाद कर दो नौकरों को साथ लेकर उस गांव के लिए निकल पड़ा। जब वह रास्ते में किशन गढ़ गांव के समीप पहुंचा तो वहां पानी का सरोवर देख कर उसने विचार किया कि यहां रुक कर कुछ देर सुस्ता लिया जाए। सरोवर में बैल पानी पी लेंगे और वहां पर हरी हरी घास चर कर अपनी भूख मिटा लेंगे। मन में यह विचार आते ही उसने एक अच्छी जगह देख कर गाड़ी रोक दी। नौकरों ने बैल खोल दिए। वहीँ पर उसने आराम करने के लिए चद्दर बिछा दी। पहले कुछ देर सुस्ताने के बाद उसने भोजन किया। नौकरो ने भी भोजन किया।
दोनों बैल सरोवर के आसपास घूम घूम कर हरी हरी घास का आनंद उठाने लगे। एक बैल चरते चरते कुछ आगे निकल गया। एक पेड़ की छांव में वह कुछ देर खड़ा होकर सुस्ताने लगा। फिर उसने जैसे ही पानी पीने के लिए कदम बढ़ाया उसका पैर वहां दल दल में धंस गया। वह निकलने की जितनी कोशिश करता उतना ही धंसता जाता।
जब यह बात सेठ जी को पता चली तो वह दोनों नौकरों को साथ लेकर उस ओर दौड़ पड़े । तीनों ने मिलकर बैल को निकालने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। इस से सेठ बड़ा दुखी था। दूसरी तरफ सेठ जी को मेले में जाने की फ़िक्र सताने लगी। शाम हो चली थी। घंटों के प्रयास के बावजूद जब बैल उस दलदल से बाहर नहीं निकला, तो सेठ जी सोच में पड़ गए। उन्हें कीमती बैल के खोने का गम सताने लगा। जब उनके सारे प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने बैल को उसकी किस्मत पर छोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला किया।
बैल को वहां फंसे दो दिन हो गए थे। भूख से निढाल वह अधमरा हो गया था। तभी उधर से एक गडरिया अपनी बकरियां चराते हुए निकला। उसने जब बैल को इस हालत में देखा तो उसे इस पर बहुत तरस आया। वह सोच ने लगा की ऐसा कौन निष्ठुर व्यक्ति है जो इस बेचारे को इस हालत में
मरता छोड़ कर चला गया है।
गडरिये को रह रह कर उस पर तरस आ रहा था। बैल को मरता देख उस पेड़ पर चील और गिद्ध आकर जमा हो गए। कौए चारों तरफ मंडराने लगे। बैल को लगा कि अब उसकी मौत निश्चित है , वह ईश्वर को याद करने लगा। गडरिये ने जब वहां पक्षियों को मंडराते देखा तो वह मन ही मन बुदबुदाया कि ये पक्षी इसे नोंच नोंच कर जीतेजी मार डालेंगे। तब उसने उसे बचाने की सोची, पर बचाया कैसे जाए उस की समझ में नहीं आ रहा था।
उसके मन में एक विचार कौंधा। उसने अपने चारों तरफ नजर दौड़ाई, फिर वह उस तरफ बढ़ गया जिधर कुछ बेलें लटकी हुई थीं। उसने एक मजबूत बेल तोड़ी। उसे उसने मरोड़ कर एक मजबूत रस्सी बनाई, फिर उसको बैल के चारों तरफ बांध दिया और दूसरा सिरा पेड़ की एक मजबूत डाल पर गिरा दिया। उस सिरे पर बड़े बड़े पत्थर ला कर बांध दिए। अब उसने जोर लगा कर उसे खींचना शुरू किया। थोड़ी कोशिश के बाद बैल अपनी जगह से हिलने लगा। गडरिया अब पहले से ज्यादा कोशिश करने लगा। आख़िरकार उसने बैल को उस दलदल से बाहर निकाल लिया। बैल ने उठने की कोशिश की तो वह वहीँ लुढ़क गया। गडरिया समझ गया कि वह कमजोरी के कारण लुढ़क गया है। काफी देर तक वह उसे सहलाता रहा, फिर वह उसके लिए हरी हरी घास लेकर आया। बैल भूखा तो था ही। उसने धीरे धीरे घास खानी शुरू की। इस के बाद गडरिया बकरियां लेकर अपने घर चला गया।
अगले दिन वह सुबह जल्दी वहां आ गया। उसने देखा कि बैल उठकर घास चर रहा है। जैसे ही बैल ने गडरिए को देखा तो वह पूंछ हिलाता हुआ उसकी ओर बढ़ा। गडरिया उसको काफी देर तक सहलाता रहा। अब बैल पूरी तरह स्वस्थ हो गया था।
एक सप्ताह बाद सेठ जी वापस लौटे। उन्हेँ उम्मीद थी कि बैल मर चुका होगा। वह उस तालाब के पास पहुंचे, लेकिन वहां बैल को न पाकर वह हैरान हो गए। तभी उन्हें सामने से बैल आता हुआ दिखाई दिया। उसे देख कर सेठ जी की बांछें खिल उठीं।
उन्होंने नौकरों को उसे ले चलने को कहा तो बैल बोला, ' मैं आपके साथ नहीं जाऊंगा, यहीं रह कर बाकी जिंदगी बिताऊंगा।'
उसकी यह बात सुनकर सेठ जी चौंके, फिर बोले ,' मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूं।
आपकी बात सही है , पर आपका प्यार स्वार्थ भरा है। मैं आपका काम करता था तो आप मुझे प्यार करते थे । लेकिन संकट के समय आप दौलत के लालच में मुझे मरने के लिए अकेला छोड़ कर चलते बने। दूसरी तरफ उस गडरिए की मानवता देखिए जिसने बिना स्वार्थ के मेरी जान बचाई।
सुख के समय तो सभी प्यार करते हैं। पर जो संकट के समय काम आता है वही असली हितैषी होता है । इसलिए मैंने निर्णय किया है कि मैं गडरिए की सेवा करके अपना बाकी जीवन बिताऊंगा। यह कह कर बैल पास के जंगल में चला गया।
-विनोद हर्ष
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