Wednesday, 10 August 2016

Kids Inspirational Story : Samajhdar kekda

                                                             समझदार   केंकड़ा 

जम्बो नगर की पहाड़ियों के बीच एक बहुत बड़ा सरोवर था। उस सरोवर में अनेकों तरह की छोटी  बड़ी मछलियां थीं। उस में  कुछ कछुए और केकड़े भी थे। केकड़ों का सरदार डेंगा बड़ा ही तेज और  समझदार था। क्योंकि सरोवर में कोई पक्षी  न होने के कारण मछलियां भयमुक्त थीं। 

एक रोज की बात है कि  सौरव नाम का बगुला वहां से उड़ता हुआ निकला। वह अपनी मौसी से मिलने जा रहा था। वह उड़ते उड़ते काफी थक चुका  था। उसको प्यास लग रही थी। उसने इधर उधर नजर घुमाई तो उसे यह  सरोवर  दिखाई दिया तो उसने वहां रुक कर पानी पीने और कुछ देर सुस्ताने का विचार किया। 
बगुले ने जम कर  पानी पिया और जब वह सुस्ताने लगा तो उसकी नजर उन मछलियों पर पड़ी जो वहां कुलाचे मार रहीं थीं।  उन्हें देख उसका मन ललचाने लगा। उसने सोचा कि अगर दो तीन मछलियां निगल लूं तो किसी को पता भी नहीं चलेगा।  यह सोच कर उसने इधर उधर नजर घुमाई। जब उसे विश्वास हो गया कि उसे कोई देख नहीं रहा है तो उसने अपनी चोंच में धीरे  से पानी में ऐसे डाली जैसे वह पानी पी रहा हो। उसके मुह में छोटी छोटी दो तीन मछली आ गईं। ऐसा स्वाद उसने आज तक नहीं चखा था। उसने मौसी के यहां जाने का इरादा त्याग दिया और कुछ दिन वहीँ बिताने का मन ही मन फैला लिया। 
जब बगुला यह सब कर रहा था, वहीँ पास में एक बड़े से पत्थर के पीछे बैठा केकड़ा उसकी  इस हरकत  को  देख रहा था। वह समझ गया कि यह कोई खतरनाक पक्षी  है। मन में यह विचार आते ही वह मन ही मन घबराया, फिर कुछ सोच कर मछली रानी के पास पहुंचा। 
केकड़े ने रानी को बताया कि ये जो नया पक्षी आया है वह बहुत खतरनाक लगता है। मैंने उसे कई छोटी  मछलियों को चुपचाप खाते देखा है। अगर हमने इसे समय रहते भगाने की कोई  जुगत नहीं लगाई तो यह सारी  मछलियां चट कर जायेगा। यह सुनकर रानी बोली,' तो हम क्या करें। यह मुसीबत तो हम पहली बार देख रहें हैं।' दोनों ने कुछ देर मंत्रणा की फिर वे दोनों जगदल कछुए के पास पहुंचे।  जब उसको  बगुले के बारे में बताया तो वह भी हैरान हो गया।
कछुए  ने उन्हे  सलाह दी कि पहले तो मछलियों को उस ओर जाने से रोका जाएऔर  केकड़ा इस पर बराबर नजर रखेगा। 
रानी मछली ने सारी  मछलियों की आपात मीटिंग बुलाई । उस मीटिंग में मछलियों को हिदायत दी गई कि  कोई भी मछली किनारे की तरफ नहीं जाएगी। खासकर उस तरफ जिधर वह पक्षी  खड़ा हो।   
अपने आसपास मछलियां न देख कर बगुला परेशान हो गया।  सारा दिन बीत गया, पर एक भी मछली उसके हाथ नहीं लगी तो उसने सरोवर में  कुछ अंदर जाकर मछलियों का शिकार करने का मन बनाया। केकड़ा उसकी गतिविधि पर बराबर नजर बनाए हुए था।  
जैसे  ही बगुला ने आगे कदम बढ़ाया, केकड़ा उसके पैरों में लिपट गया। बगुला दर्द से कराह उठा और एक दम पीछे हट गया। 
दूसरे दिन भी उसे अपने आसपास एक भी मछली नहीं दिखी।   दो दिन से भूखा बगुला अधमरा हो गया। 
तब मौका देख कर केकड़ा उसके सामने आया और बोला ,' लगता है तुम  यहां के लिए नए हो?  मैं भी यहां कुछ दिन पहले ही आया हूं। यहां की रानी मछली काफी घमंडी है ।  वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती है। अगर हम दोनों मित्र बन जाएं  तो इस सरोवर पर अपना दबदबा कायम  कर सकते हैँ।' 
बगुला  मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देने लगा। 
'मुझे तुम्हारा प्रस्ताव मंजूर है।' बगुला बोला। 
'तो फिर मिलाओ हाथ अब से हम दोनों मित्र बन गए।' केकड़ा चिहुक कर बोला। 
'मित्र यह तो बताओ सारी  मछलियां अचानक  गायब कहां हो गईं?  कल से  मेरे पेट में एक भी दाना नहीं गया है। भूख के मारे मेरी जान निकल रही है।'   
'मित्र मैं समझ सकता हूं तुम्हारी पीड़ा। वे सब पास के सरोवर में सैर करने निकल गई हैं। अगर तुम  चाहो तो मैं तुम्हे उन तक ले जा सकता हूं । फिर वहां मजे से मछलियां खा कर अपना पेट भरना। 
'तुम्हारे हिसाब से वह तालाब  यहां  से कितनी दूर होगा?' बगुले ने पूछा। 
'यहीं पास में है।' केकड़े ने जबाव दिया। 
केकड़ा बगुले की पीठ पर बैठ गया। बगुला उसके बतलाये  रास्ते पर ले उड़ा।  केकड़ा उसे कभी इधर तो कभी उधर घुमाता रहा।  जब बगुले की हिम्मत जबाव देने लगी तो बगुला दुखी होकर बोला ,' तुम तो कह रहे थे कि सरोवर पास में ही है।  घंटों  हो गए मुझे इधर उधर घूमते, अब तो मेरी हिम्मत जबाव दे रही है। मुझे लगता है कि मैं यहीं गश खा कर गिर जाऊंगा। '
केकड़ा यही तो चाहता था। वह दुखी हो कर बोला ,' सरोवर था तो यहीं। ,लगता है हम रास्ता भटक गए हैं। ऐसा करो वापस चलो। मित्र अब तक तो वे वापस लौट भी गई होंगी।  
बगुले की हिम्मत जबाव दे रही थी। वह बड़ी मुश्किल से सरोवर पंहुचा और पहुंचते ही बेहोश होकर लुढक गया। केकड़े को इसी मौके की तलाश थी। उसका इशारा पाते ही सारे केकड़े उस पर झपट पड़े और उसे नौच नौंच कर मार डाला।  यह देख कर मछलियां ख़ुशी से उछलने लगीं। इस तरह केकड़े की  सूझबूझ से  वहां बगुले के रूप में आया संकट टल गया। 

-विनोद हर्ष 

Short Children Story : Pyar Do Pyar Lo

                                                                        प्यार दो प्यार लो 

जगत पुर कस्बे  में एक बड़ा पार्क था, जो चारों तरफ से बड़े बड़े पेड़ पौधों से घिरा हुआ था। उन पेड़ों पर अनेक पक्षियों ने अपने घोंसले बना रखे थे। सुबह सुबह पार्क में घूमने वालों  की भीड़ रहती थी । पक्षी भी उड़ान  भर कर किल्लोल करते रहते थे, जिस से पार्क का वातावरण बड़ा ही रमणीक बना रहता।  

कुछ दिनों से उस पार्क में एक भिखारी आकर बैठने लगा था । उसे जो कुछ भीख में मिलता उसमें से कुछ हिस्सा वह पक्षियों को डाल देता। पक्षी उसके फैंके खाने  को  चुग तो लेते , पर उनके मन में यह भय बना रहता कि कहीं यह बहेलिया न हो जो हमें इस तरहं का लालच दे कर अपने जाल  में फंसा  ले। इसलिए वे उसका डाला हुआ खाना बड़ी सावधानी के साथ चुगते। 
भिखारी अक्सर वहीँ पार्क में सो कर रात  बिताता।  जब कई महीनें बीत गए और उस भिखारी ने उनको कोई  हानी  नहीं पहुंचाई तो अब वे उसके आसपास भी मंडराने लगे। भिखारी भी उन्हें अपने पास पाकर उनको पुचकारता और प्यार करता। इस तरह अब वे एक दूसरे से हिलमिल गए थे। 
एक दिन की घटना है कि कलगी नाम का मोर उडान भरते हुए पेड़ की एक डाली  से टकरा गया और नीचे आ गिरा। जमींन  पर गिरते ही मोर करहाया ।  भिखारी उस समय वहीँ बैठा था।  वह दौड़ कर उसके पास पहुंचा और उसे अपनी गोद  में लेकर सहलाने लगा। फिर झटपट जा कर पानी लेकर आया और मोर को पिलाया जिस से उस की  झटपटाहट  कुछ कम हुई। इस बीच दूसरे पक्षी भी वहां जमा हो गए। भिखारी ने  ध्यान से जब मोर की टांग को देखा तो वह समझ गया कि इसके पैर में चोट आई है। इसके बाद उसने अपने अंगोछे को फाड़ कर धीरे से उसके पैरों में लपेट दिया। 
शाम को भिखारी अपने साथ कुछ  पट्टी और दवाई लेकर आया। चार पांच दिन के उपचार के बाद मोर बिलकुल ठीक हो गया।   
सर्दी का मौसम था। उस रात सर्दी कुछ ज्यादा ही थी।  भिखारी  अपने फटे कम्बल को लपेटे वहीँ पार्क में एक बेंच पर सोया  पड़ा था। रात को उसे लगा कि वह बुखार में तप रहा है। सारी  रात वह बुखार में पड़ा रहा। सुबह जब उसने उठने की कोशिश की तो वह वहीँ लुढ़क गया। यह देख पक्षी घबरा गए। सारे इकट्ठे हो कर  इस बात पर विचार करने लगे कि उसकी  मदद कैसे की जाए। 
बिट्टू बटेर बोला ,' लगता है इसे कोई बड़ी बीमारी हो गई है, डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा।'
'पर हम इसे वहां तक लेकर कैसे जाएंगे?'  मिट्ठू तोता बोला। 
इस पर मिनी गोरैया  बोली ,' क्यों न हम डॉक्टर को यहाँ बुला लाएं?'
'बात  तो ठीक है ,पर हम तो किसी डॉक्टर को जानते नहीं !' सुरीली मैना बोली। 
इस पर लोटन  कबूतर ने कहा ,' इसकी फ़िक्र मत करो।  मैं एक डॉक्टर को जानता हूं। कुछ समय पहले  मैं और गुटकी उसके क्लिनिक में घोंसला बना कर रहे थे। '
'पर उसे हम समझायेंगे कैसे? हम तो आदमियों की भाषा  जानते  नहीं।' वहां लटकी सुरीली कोयल ने शंका जाहिर की तो चंचल मैंना  बोल  पड़ी ,' इसकी फ़िक्र छोड़ो। मैं  कई साल एक आदमी के पिंजरे में कैद रही हूं।  आदमी की  भाषा मैं बड़ी आसानी से बोल लेती हूं।' 
यह सुन कर सभी के चेहरे खिल उठे। 
लोटन कबूतर उन्हें लेकर डॉक्टर के क्लिनिक पहुंचा। क्लिनिक पर अभी मरीजों की भीड़ लगी थी। जब मरीज छंट गए तो मैना और लोटन कबूतर डॉक्टर की टेबल पर जा बैठे। पक्षियों को देख  डॉक्टर घबरा  गया। 
घबराओ  नहीं डॉक्टर साहब हम यहां  इसलिए आए हैं कि हमारा एक  दोस्त बीमार पड़ गया है। आपको चल कर उसका उपचार करना है।  
उस पक्षी को मनुष्य की आवाज में बोलता देख  डॉक्टर हैरान था। पहले तो  उसके  मुह  से कोई शब्द नहीं निकला, फिर हकलाते हुए बोला ,' तो मेरे पास क्यों आए  हो ,किसी पक्षियों के डॉक्टर के पास जाओ। ' डॉक्टर बोला। 
'हमारा मरीज पक्षी नहीं आदमी है और वह बड़े पार्क में पड़ा है।  मैना का  उत्तर सुनकर डॉक्टर को  आश्चर्य हुआ। जब मैना ने बार बार अनुरोध किया  तो डॉक्टर  अपना बैग उठाकर चलने के लिए उठ खड़ा हुआ। 
यह देख खिड़की में लटके साथी ख़ुशी से झूम उठे। 
मैना डॉक्टर की गाड़ी के आगे उड़कर रास्ता दिखा रही थी। 
पार्क में पहुंच कर डॉक्टर ने भिखारी की अच्छी तरह जाँच की। वह मन ही मन बुदबुदाया इसे निमोनिया है। तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा। तभी उसने मोबाइल पर किसी को फोन किया। फिर उसने भिखारी को  एक इंजेक्शन लगाया। 
यह सब वहां जमा पक्षी बड़ी उत्सुकता से  देख  रहे थे।  तभी उन्होंने देखा एक गाड़ी वहां आकर रुकी। यह ऐंम्बुलेंस थी। उस में से सफ़ेद वर्दी पहने दो आदमी उतरे और भिखारी  को उसमें डाल कर ले गए। वे उसे लेकर सिटी अस्पताल पहुंचे जहाँ उसका इलाज होना था। कुछ पक्षी भी एम्बुलेंस के साथ उड़ते हुए  अस्पताल पहुंचे। 
पंद्रह दिन बाद भिखारी को अस्पताल से छुट्टी मिली। भिखारी  जाने लगा तो  डॉक्टर ने उसे  बताया कि उसके पक्षी मित्रों ने उसकी जान बचाई है। फिर डॉक्टर ने विस्तार से उसे सारी  बात बताई। 
पार्क में पहुँच कर उसने सभी पक्षी मित्रों का आभार व्यक्त किया । भिखारी को वहां आया देख सभी पक्षी  उड़ उड़ कर ख़ुशी जाहिर करने लगे। 

-विनोद हर्ष 

Thursday, 4 August 2016

Motivational and Inspiring Children Story : Sohbat Ka Asar

                                                                        सोहबत का असर

राजू अपनी नानी से मिलने गांव आया था। रात को जब वह सोने लगा उसके कानों में किसी के ऊँचे स्वर में बोलने की धमकी भरी आवाज पड़ी। फिर थोड़ी देर बाद उसे किसी के रोने चिल्लाने की आवाज भी सुनाई दी।  उसने नानी से पूछा ,'नानी ,यह आवाज कैसी आ रही  है ?' शायद कोई किसी बच्चे को पीट रहा है।' 
'यह आवाज ! अरे हमारे वर्मा अपने लड़के पिंटू  की धुनाई कर रहे होंगे।'
धुनाई ! लेकिन क्यों?' राजू ऐसे चौंकते  हुए बोला जैसे नानी ने कोई अनोखी बात कह दी हो। 
'बात यह है कि  पिंटू बुरी संगत  में पड़कर बिगड़ गया है।  पढ़ने का नाम ही नहीं लेता। मोहल्ले वालों से रोज रोज झगड़े मोल लेता रहता है। साथ में वह छोटी मोटी चोरी भी करने लगा है। अब तू ही बता ऐसे बेटे को कोई पीटे नहीं तो क्या करे।' नानी ने समझाया। 
अगली सुबह राजू अपने घर के बाहर खड़ा था कि पड़ोस के लड़के ने जानबूझ के अड़ंगी लगा कर उसे गिरा दिया। राजू को बहुत आश्चर्य हुआ।  उस ने उठते हुए कहा, 'मैंने तो तुम्हें कुछ नहीं कहा, फिर तुमने ऐसा क्यों किया?'
'अबे चल ! क्या 'तू मझे घूर नहीं  रहा था?' पिंटू ने उस पर आरोप लगाया।  तभी सामने से अपने पिताजी को आते देख वह चुपचाप खिसक गया। शाम को राजू एक हलवाई की दुकान पर खड़ा था कि इसी बीच पिंटू भी अपने दलबल सहित वहीँ आकर खड़ा  हो गया। 
अरे मोटू , साहब को अछे समोसे देना , कहीं नया पंछी समझकर लूट ले !
एक बार राजू ने पिंटू की तरफ देखा। उसको अपनी ओर देखता पाकर पिंटू सहित सभी साथी एक ठहाका लगाकर हंस पड़े।  मोटू हलवाई ने भी हंसी में  साथ दिया। पर राजू अब भी चुप रहा। 
तभी वहां खड़े लड़कों में से एक बोला ,' मेरा यार गूंगा लगता है। पहले तो बड़ी जबान चला रहा था।' 'पिंटू बोला ,' अछा ' इसी के साथ फिर एक बार जोरदार ठहाका लगा। 
मोटू हलवाई ने राजू की तरफ समोसे बढ़ाए तो पिंटू ने बीच में ही उससे छीन लिए।  इस पर राजू को क्रोध आ गया और उसने पलट कर पिंटू को जोरदार झापड़ दिया। अचानक झापड़ से एक बार तो पिंटू और उसके साथी स्तंभित रह गए ,पर अगले ही क्षण पिंटू राजू से उलझ गया। पिंटू ने समझा था कि वह उसे गिरा ही देगा। पर यह उसकी भूल थी। कुछ ही देर में राजू  पिंटू पर भारी पड़ने लगा। लेकिन उनको इस तरह लड़ता देख वहां के कुछ लोगों ने आगे  बढ़ कर दोनों को छुड़ा दिया।  

अगले दिन राजू को  पिंटू के पिताजी को पिंटू के साथ घर में घुसते हुए देखा तो उसका माथा ठनका। वर्मा जी ने राजू को बुलवाया और पूछा ,'बेटा, कल बड़े बाजार में पिंटू ने तुमसे झगड़ा किया था. तुमने  मुझसे शिकायत क्यों नहीं की?'
'लेकिन अंकल ,इसने तो मुझ से कोई झगड़ा  नहीं किया .' क्या कहते हो बेटा , मुझे अमरकांतजी  ने सब कुछ बता दिया है।'
'अरे अंकल , उसे आप लड़ाई कहते हैं। फिर दूसरे गलती मेरी ही थी। मुझ से ही इसका समोसा गिर गया था।  अमरकांत जी को जरूर ग़लतफ़हमी हुई होगी।' राजू ने सहज भाव से कहा। 
पिंटू का जवाब सुन कर पिंटू आश्चर्य चकित रह गया। 
उसी शाम को जब राजू बाजार में घूम रहा था ,उसकी नजर  पिंटू पर पड़ी। पिंटू ने भी राजू को देखा। यद्यपि पिंटू सुबह की घटना से राजू से प्रभावित तो था, पर इतनी आसानी से किसी के आगे झुकना उसकी शान के खिलाफ था।
घूमता  राजू  पिंटू के पास से निकलने लगा, तो राजू ने उसके चेहरे पर नजर डाली। इस पर पिंटू मुंह फुला कर दूसरी ओर देखने लगा। पहले तो राजू सीधा जाने लगा, पर न जाने क्या सोच कर पलटा और पिंटू से  बोला,'  लगता है  तुम मुझसे नाराज हो ?' 
' क्या मतलब ?' पिंटू ऐंठते हुए बोला। 
'दरअसल  मैं   यहाँ के लिए नया हूं। तुम यह भी जानते हो कि यहां  मेरा कोई साथी भी नहीं है।  क्या हम दोनों मित्र नहीं बन सकते?'  राजू ने यह बात बड़े ही सरल भाव से कही। 
राजू की यह बात सुन कर पिंटू की त्यौरियां कुछ कम  हुईं। उसने राजू के चेहरे को अविश्वास के साथ देखा। लेकि बोला कुछ भी नहीं। 
'क्या सोच रहे हो? ठीक  है, शायद तुम मुझे अपना मित्र बनाने के काबिल नहीं समझते।' यह कहकर राजू चलने लगा। 
तब पिंटू ने उसे रोकते हुए कहा,' नहीं ऐसा  नहीं, पर कल जो मैंने तुम्हारे साथ किया, उसके बाद भी मुझ से दोस्ती करना चाहते हो!
'अरे छोड़ो भी। इस तरह की छेड़छाड़ होती ही रहती है।' राजू बोला। 
 राजू की यह बात सुन कर पिंटू मुस्कुरा पड़ा और आगे बढ़ कर दोस्ती का हाथ मिलाया।
 'तो फिर इस नई  दोस्ती पर मोटू हलवाई के समोसे हो  जाएं। ' पिंटू ने प्रस्ताव रखा। 
'हां हां  क्यों नहीं !
पिंटू ने पैसे देने के लिए दस रूपये का नोट निकाला, जिसे देख कर राजू को कुछ अश्चर्य हुआ।  
समोसे खा कर दोनों मंदिर वाले पार्क की ओर बढ़ गए। रास्ते में राजू  ने  पूछा, ' पिंटू, क्या तुम्हारे पिताजी इतना सारा जेब खर्च देते हैं ?'
'शायद तुम मेरे पास दस रूपये का नोट देख कर कह रहे हो? अभी  तो दोस्त  तुमने एक ही नोट की झलक देखी है।' तभी  उसने जेब में हाथ डालकर दस दस के कुछ नोट और दिखाए ,'क्यों केसी रही!'
राजू ने इस बार और भी आश्चर्य के साथ  पूछा, ' तो क्या यह तुम्हें घर से मिलते हैं?'
'अरे घर पर कौन देगा! मैं तो हाथ की सफाई से प्राप्त करता हूं।'  यह कह कर पिंटू ने गर्व  के साथ राजू को देखा। 'यानि कि तुम चोरी कर के लाते 
हो।' राजू बोला। 
'भई  तुम इसे कुछ भी कहो। मैं तो इसे हाथ की सफाई के नाम से पुकारता हूं।' 
'तो तुम्हारी तरह  दोस्त भी मौज उठाने के लिए घर से चोरी करके रुपये लाते होंगे ?' राजू ने पूछ। 
'अरे वे कहाँ से लाएंगे !उन्हें तो मैं मौज कराता हूं। 'पिंटू अकड़ कर बोला। 'अगर आज से तुम उन्हें पैसे चटाने बंद कर दो, तब भी वह तुम्हारा साथ निभाएंगे?' राजू ने शंका जाहिर की। 
क्यों नहीं, हम सब बड़े पक्के मित्र हैँ। 
राजू हंसने  लगा। 
उसको हंसता देख पिंटू  बोला ,' क्यों क्या बात हुई ?' 'कुछ नहीं, मुझे लगता है कि तुम्हारे ये दोस्त केवल पैसों के यार हैं।'
'नहीं मैं नहीं मानता।' पिंटू ने विरोध किया। 
इस तरह विरोध करने से कोई बात नहीं बनती। तुम ऐसा करो कि कल से ही अपने मित्रों को चाट पकौड़ी खिलाना तथा नौटंकी दिखाना बंद कर दो।  फिर पता चलेगा कि वे तुम्हारे सच्चे मित्र हैं या केवल तुम्हारे रुपयों के लिए मित्र बने हुए हैं। कुछ सोच कर पिंटू ने यह सलाह मान ली और दोनों अपने अपने घर चले गए। 
इस तरह राजू और पिंटू की दोस्ती अब आगे बढ़ चली।  दोनों ही रोज साथ साथ घूमने जाने लगे। लेकिन राजू देख रहा था कि पिंटू कुछ कुछ परेशान दिखाई देने लगा है।  एक रोज राजू ने उससे उसकी परेशानी पूछ ही ली। पहले पिंटू ने  टालना चाहा, पर राजू के अधिक आग्रह पर उसने बतला ही दी। 
'क्या बतलाऊँ राजू भैया, तुम ठीक ही कहते थे। मेरे सारे दोस्त पैसे के ही यार थे। अब मुझ से कतराने  लगे हैं, क्योकि मैंने पैसा चटाना बंद कर दिया है। 
राजू पिंटू की बात सुन मन ही मन मुस्कुरा  रहा था। उसका तीर निशाने पर लगा था.  थोड़ा गंभीर होकर बोला, 'अच्छा  पिंटू भाई, अब तो तुम्हें अपने दोस्तों की असलियत का पता चल गया। इसके आलावा उनमें या तो कोई व्यापारी का लड़का है या दुकानदार का। वे यदि नहीं भी 
पढ़ें, तब भी दुकान पर बैठ कर चार पैसे कमा लेंगे, लेकिन तुम तो इनमें से किसी के लड़के नहीं। यदि पढ़े नहीं तो कोई चपरासी की नौकरी  भी नहीं देगा। 
राजू की बात सुन कर पिंटू गंभीर हो गया। राजू का जादू तो पहले ही उस पर चल चुका था, पर इस हादसे से वह और भी राजू का गुलाम हो गया। 
'तुम ठीक ही कहते हो, पिताजी की सही बातें मुझे खराब लगती थीं, पर तुमने मेरी ऑंखें खोल दीं। अब मैं  सब बेकार की बातें छोड़कर पढ़ाई में मन लगाऊंगा। ' पिंटू बोला। 
' यह हुई न बात, चलो इसी बात पर हो जाएं समोसे।' राजू किलकते हुए बोला।'
 हां हां क्यों नहीं ! पर भाई पैसे मैं दूंगा।' पिंटू बोला। 
'अभी नहीं'. राजू बोला।  
'फिर कब?' पिंटू ने पूछा।  'जब अपनी ईमानदारी के जेब  खर्च से खिलाओगे' राजू ने कहा। 
पिंटू कुछ झेंप गया। 
उसी रात को राजू के नाना का तार आया जिसमें राजू के पिता जी की बीमारी का जिक्र था और राजू को वापस लौटने के लिए लिखा था। 
अगले दिन शाम को गाड़ी जाती थी। राजू को उसीसे भेजने का 
निर्णय हुआ। सुबह ही जब राजू ने पिंटू से अपने पिता जी के अचानक  बीमारी के कारण लौटने की बात कही तो पिंटू का चेहरा उत्तर गया. 'क्यों क्या हुआ?'  राजू ने पूछा. 'कुछ नहीं.' लेकिन उसी के साथ उसकी आँखों में आंसू तैर गए। 
'ये आंसूं क्यों?'  राजू ने आश्चर्य से पूछा। 
'तुम ही बताओ, अब मैं किस के साथ खेलूँगा'. पिंटू ने बड़े भोलेपन से पूछा।  'बस इतनी सी बात है। अरे, अब तुम पहले वाले पिंटू नहीं रहे? अच्छे लोगों के मित्र बनते देर थोड़े ही लगती है।'  शाम को जब राजू जाने को हुआ तब पिंटू अपनी आंखों  में आंसू लिए उसके पास खड़ा था। पिंटू के मां  बाप भी राजू को धन्यवाद देने आए थे। यह देख राजू के नाना नानी की गर्दन गर्व से ऊँची हो रही थी। 
तांगा आ चुका  था। पिंटू ने राजू से कहा ,'मुझे भूलोगे तो नहीं?'
' कैसी  बात करते हो! मित्रता याद  रखने के लिए होती है न कि भुलाने के लिए. 
तुम मुझे चिट्ठी लिखना,  मैं  भी तुम्हें चिट्ठी लिखूंगा। 
'हां, पिंटू ने कहा। 
तभी  राजू के नाना बोले, 'बेटा जल्दी करो ,नहीं तो गाड़ी छूट जाएगी। 'इसी के साथ तांगा  आगे  बढ़ गया। 
-विनोद हर्ष 

Tuesday, 2 August 2016

Children story : Sher Ki Mousi

                                                                 
                                                                          शेर की मौसी

एक शहर में एक बिल्ली रहती थी। वह जिस घर  में घुसती वहीं पर उसे गालियां मिलतीं।  आखिर में तंग आकर उसने जंगल में रहने की सोची।  जब वह जंगल में पहुंचीं तो उस पर गीदड़ की नजर पड़ गई।  बिल्ली को देख कर गीदड़ बड़े ताज्जुब में पड़ गया। मन में सोच ने लगा कि इसकी शक्ल सूरत बिलकुल हमारे शेर से मिलती हे, लेकिन शरीर में बड़ी छोटी है । गीदड़ मन में यह सोचता हुआ सीधा शेर के पास पहुंचा। गीदड़ ने सिर झुकाकर शेर को बिल्ली के बारे में बतलाया और यह भी शंका जाहिर की कि पड़ौसी जंगल का शेर तो रूप बदल कर हमारे जंगल में उत्पात मचाने नहीं आ गया ? शेर को भी यह सुनकर बहुत अचम्भा हुआ। 
;मैं उसे देखना चाहता हूं। ' शेर गीदड़ से बोला। गीदड़ शेर को उसी जगह ले गया, जहाँ उसने बिल्ली को देखा था। शेर भी बिल्ली को देख ताज़्जुब में पड़ गया। शेर  बिल्ली के पास जाकर खड़ा हो गया और बोला ,'कितने आश्चर्य की बात है  तुम्हारी शक्ल तो बिल्कुल मुझ से मिलती जुलती हे ,लेकिन डीलडौल जरा सा है। तुम कौन हो ?'
बिल्ली बड़ी चालाक थी। पहले वो मुस्कराई फिर बोली ,' बेटे तूने मुझे पहचाना नहीं।  मैं तेरी मौसी हूं। आज ही शहर से आई हूं। '
'मौसी ?
'हां बेटे ,बहुत दिन पहले मैं जंगल छोड़ कर शहर चली गई थी। 'लेकिन मौसी तुम्हारा शरीर इतना छोटा कैसे हो गया ?
'तू नहीं समझेगा  बेटे यह सब आदमी का काम है। तू नहीं जानता
 आदमियों के बीच में रहना कितना मुश्किल काम है।
;ऐसी बात है तो  मैं आदमी को देखना चाहता  हूं , वह मुझे कैसे तुम्हारे जैसा बना सकता है।
बिल्ली चालाक तो थी ही ,इसलिए उसने सोचा अब तो शेर को किसी मनुष्य से टकराना पड़ेगा। बिल्ली शेर को अपने साथ एक गांव की तरफ ले चली.वहीं गांव के बाहर एक किसान हुक्का गुड़गुड़ा रहा था. बिल्ली ने दूर से शेर को इशारे से उस किसान को दिखाते हुए कहा ,'वह  है मनुष्य। '
शेर फ़ौरन ही उस किसान के सामने पहुंच गया और दहाड़ा 'तुम मनुष्य हो, मैं तुमसे निपटने आया हूं। 'किसान पहले तो घबराया ,फिर कुछ सोच कर बोला।  'ठीक है मैं भी तैयार हूं ,लेकिन  आज मैं अपनी शक्ति घर पर ही छोड़ आया हूं ,इसलिए अगर मुझे   थोड़ी  देर का समय  दो तो मैं उसे ले आऊं। '
शेर एकदम राजी हो गया। 'लेकिन एक  बात है  तुम पीछे से डर कर भाग गए तो  मेरे आने जाने की मेहनत भी बेकार चली जाएगी। इसलिए एक शर्त पर मैं जा सकता हूं कि तुम्हे पेड़ से बांध कर आऊंगा ताकि तुम मेरे
आने तक भागो नहीं। '
'मुझे मंजूर है। ' शेर ने कहा।
किसान पास से एक मोटी रस्सी ले आया।  उस रस्सी से शेर को कसकर बांध दिया। फिर किसान एक मजबूत डंडा लाया। उससे उसने शेर की खूब मरम्मत की।
शेर जान बचा कर वहां से भाग। थोड़ी दूर पर बिल्ली बैठी यह तमाशा देख रही थी।  जब शेर उसके पास से गुजरा  तो बिल्ली बोली ,' क्यों बेटा  मनुष्य देख लिया। '
'हां ' मौसी।' शेर हाथ जोड़कर बोला ,' यह तुम्हारी ही हिम्मत है जो तुमने मनुष्य के बीच में अपनी जगह बना ली और यह कहकर शेर जंगल में  गायब हो गया।

-विनोद हर्ष

Monday, 1 August 2016

Moral Story : Asli Hitashi

                                                                         असली हितैषी  

सूरज पुर गांव में  पूरणमल नाम का एक सेठ  रहता था। उसके पास दो बैल थे।  वह उन्हें बहुत प्यार  करता था। वे भी उसके काम के लिए हमेशा  तैयार रहते। वह अक्सर अपनी गाड़ी में उन्हें जोत कर सामान लादकर  इधर उधर जाता। एक बार पास के गांव में मेला लगा। सेठ जी ने वहां माल ले जाकर बेचने पर विचार किया।  जब मेले का दिन आया तो सेठ अपनी गाड़ी में सामान लाद कर दो नौकरों को साथ लेकर उस गांव के लिए निकल पड़ा। जब वह रास्ते में किशन गढ़ गांव के समीप पहुंचा तो वहां पानी का सरोवर देख कर उसने विचार किया कि यहां रुक कर कुछ देर  सुस्ता लिया जाए।  सरोवर में बैल पानी पी लेंगे और वहां पर हरी हरी घास चर कर अपनी भूख मिटा लेंगे। मन में यह विचार आते ही उसने एक अच्छी  जगह देख कर गाड़ी रोक दी।  नौकरों ने बैल खोल दिए। वहीँ पर उसने आराम करने के लिए चद्दर बिछा दी। पहले कुछ देर सुस्ताने के बाद उसने भोजन किया। नौकरो ने भी भोजन किया।  
दोनों बैल सरोवर के आसपास घूम घूम कर हरी हरी घास का आनंद उठाने  लगे। एक बैल चरते चरते कुछ आगे निकल गया। एक पेड़ की छांव में वह कुछ देर खड़ा होकर  सुस्ताने लगा।  फिर उसने जैसे ही पानी पीने के लिए कदम बढ़ाया उसका पैर वहां दल दल में धंस गया। वह निकलने की जितनी कोशिश करता उतना ही धंसता जाता। 
जब यह  बात सेठ जी को पता चली तो वह दोनों नौकरों को साथ लेकर उस ओर दौड़ पड़े । तीनों ने मिलकर बैल को निकालने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वह  टस से मस नहीं हुआ। इस से सेठ बड़ा दुखी था। दूसरी तरफ सेठ जी  को मेले में जाने की फ़िक्र सताने लगी। शाम हो चली थी।  घंटों के प्रयास के बावजूद जब बैल उस दलदल से बाहर नहीं निकला, तो सेठ जी सोच में पड़ गए।  उन्हें  कीमती बैल के खोने का गम सताने लगा। जब उनके सारे प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने बैल को उसकी किस्मत पर छोड़ कर आगे बढ़ने का फैसला किया।  
बैल को वहां फंसे दो दिन हो गए थे।  भूख से निढाल वह अधमरा हो गया  था। तभी उधर से एक गडरिया अपनी बकरियां चराते हुए निकला।  उसने जब बैल  को इस हालत में देखा तो उसे इस पर बहुत तरस आया। वह सोच ने लगा की ऐसा कौन निष्ठुर व्यक्ति है जो इस बेचारे को इस हालत में  
मरता छोड़ कर चला गया है। 
गडरिये को रह रह कर उस पर तरस आ रहा था। बैल को मरता देख उस पेड़ पर चील और गिद्ध  आकर जमा हो गए। कौए चारों तरफ मंडराने लगे। बैल  को लगा कि अब उसकी मौत  निश्चित है , वह ईश्वर को याद करने लगा। गडरिये ने जब वहां पक्षियों को मंडराते देखा तो वह मन ही मन बुदबुदाया कि ये पक्षी इसे नोंच नोंच कर जीतेजी मार डालेंगे। तब उसने उसे बचाने की सोची, पर बचाया कैसे जाए उस की समझ में नहीं आ रहा था। 
 उसके मन में एक विचार कौंधा।  उसने अपने चारों  तरफ नजर दौड़ाई, फिर वह उस तरफ बढ़ गया जिधर कुछ बेलें लटकी हुई थीं। उसने एक मजबूत बेल तोड़ी। उसे उसने मरोड़ कर एक मजबूत रस्सी बनाई, फिर उसको बैल के चारों तरफ बांध दिया और दूसरा सिरा पेड़ की एक मजबूत डाल पर गिरा दिया। उस सिरे पर बड़े बड़े पत्थर ला कर बांध दिए। अब उसने जोर लगा कर उसे खींचना शुरू  किया। थोड़ी कोशिश के बाद बैल अपनी जगह से हिलने लगा। गडरिया अब पहले से ज्यादा कोशिश करने लगा। आख़िरकार उसने बैल को उस दलदल से बाहर निकाल लिया। बैल ने उठने की कोशिश की तो वह वहीँ लुढ़क गया। गडरिया समझ गया कि वह कमजोरी के कारण लुढ़क गया है। काफी देर तक वह  उसे सहलाता रहा, फिर वह उसके लिए हरी हरी घास लेकर आया। बैल भूखा तो था ही। उसने धीरे धीरे घास खानी शुरू की। इस के बाद गडरिया बकरियां लेकर अपने घर चला गया। 
अगले दिन वह सुबह जल्दी वहां आ गया।  उसने देखा कि बैल उठकर घास चर रहा है।  जैसे ही बैल ने गडरिए को देखा तो वह पूंछ हिलाता हुआ उसकी ओर बढ़ा।  गडरिया  उसको काफी देर तक सहलाता रहा। अब बैल पूरी तरह स्वस्थ हो गया था। 
एक  सप्ताह बाद सेठ जी वापस लौटे। उन्हेँ उम्मीद थी कि बैल मर चुका होगा। वह उस तालाब के पास पहुंचे,  लेकिन वहां बैल को न पाकर वह हैरान हो गए। तभी उन्हें सामने से बैल आता हुआ दिखाई दिया। उसे देख कर सेठ जी की बांछें खिल उठीं। 
उन्होंने नौकरों को उसे ले चलने को कहा तो बैल बोला, ' मैं आपके साथ नहीं जाऊंगा, यहीं रह कर बाकी जिंदगी बिताऊंगा।'
उसकी यह बात सुनकर सेठ जी चौंके, फिर बोले ,' मैं  तुम्हे बहुत प्यार करता हूं। 
आपकी बात सही है , पर आपका प्यार स्वार्थ भरा है। मैं  आपका काम करता था तो आप मुझे प्यार करते थे । लेकिन संकट के समय आप दौलत के लालच में मुझे मरने के लिए अकेला छोड़ कर चलते बने। दूसरी तरफ उस गडरिए की मानवता देखिए जिसने बिना स्वार्थ के मेरी जान बचाई। 
सुख के समय तो सभी प्यार करते हैं। पर जो संकट के समय काम आता है वही असली हितैषी  होता है । इसलिए मैंने निर्णय किया  है कि मैं गडरिए की सेवा करके अपना बाकी जीवन बिताऊंगा। यह कह कर बैल पास के जंगल में चला गया। 
 -विनोद हर्ष