सोहबत का असर
राजू अपनी नानी से मिलने गांव आया था। रात को जब वह सोने लगा उसके कानों में किसी के ऊँचे स्वर में बोलने की धमकी भरी आवाज पड़ी। फिर थोड़ी देर बाद उसे किसी के रोने चिल्लाने की आवाज भी सुनाई दी। उसने नानी से पूछा ,'नानी ,यह आवाज कैसी आ रही है ?' शायद कोई किसी बच्चे को पीट रहा है।'
'यह आवाज ! अरे हमारे वर्मा अपने लड़के पिंटू की धुनाई कर रहे होंगे।'
धुनाई ! लेकिन क्यों?' राजू ऐसे चौंकते हुए बोला जैसे नानी ने कोई अनोखी बात कह दी हो।
'बात यह है कि पिंटू बुरी संगत में पड़कर बिगड़ गया है। पढ़ने का नाम ही नहीं लेता। मोहल्ले वालों से रोज रोज झगड़े मोल लेता रहता है। साथ में वह छोटी मोटी चोरी भी करने लगा है। अब तू ही बता ऐसे बेटे को कोई पीटे नहीं तो क्या करे।' नानी ने समझाया।
अगली सुबह राजू अपने घर के बाहर खड़ा था कि पड़ोस के लड़के ने जानबूझ के अड़ंगी लगा कर उसे गिरा दिया। राजू को बहुत आश्चर्य हुआ। उस ने उठते हुए कहा, 'मैंने तो तुम्हें कुछ नहीं कहा, फिर तुमने ऐसा क्यों किया?'
'अबे चल ! क्या 'तू मझे घूर नहीं रहा था?' पिंटू ने उस पर आरोप लगाया। तभी सामने से अपने पिताजी को आते देख वह चुपचाप खिसक गया। शाम को राजू एक हलवाई की दुकान पर खड़ा था कि इसी बीच पिंटू भी अपने दलबल सहित वहीँ आकर खड़ा हो गया।
अरे मोटू , साहब को अछे समोसे देना , कहीं नया पंछी समझकर लूट ले !
एक बार राजू ने पिंटू की तरफ देखा। उसको अपनी ओर देखता पाकर पिंटू सहित सभी साथी एक ठहाका लगाकर हंस पड़े। मोटू हलवाई ने भी हंसी में साथ दिया। पर राजू अब भी चुप रहा।
तभी वहां खड़े लड़कों में से एक बोला ,' मेरा यार गूंगा लगता है। पहले तो बड़ी जबान चला रहा था।' 'पिंटू बोला ,' अछा ' इसी के साथ फिर एक बार जोरदार ठहाका लगा।
मोटू हलवाई ने राजू की तरफ समोसे बढ़ाए तो पिंटू ने बीच में ही उससे छीन लिए। इस पर राजू को क्रोध आ गया और उसने पलट कर पिंटू को जोरदार झापड़ दिया। अचानक झापड़ से एक बार तो पिंटू और उसके साथी स्तंभित रह गए ,पर अगले ही क्षण पिंटू राजू से उलझ गया। पिंटू ने समझा था कि वह उसे गिरा ही देगा। पर यह उसकी भूल थी। कुछ ही देर में राजू पिंटू पर भारी पड़ने लगा। लेकिन उनको इस तरह लड़ता देख वहां के कुछ लोगों ने आगे बढ़ कर दोनों को छुड़ा दिया।
अगले दिन राजू को पिंटू के पिताजी को पिंटू के साथ घर में घुसते हुए देखा तो उसका माथा ठनका। वर्मा जी ने राजू को बुलवाया और पूछा ,'बेटा, कल बड़े बाजार में पिंटू ने तुमसे झगड़ा किया था. तुमने मुझसे शिकायत क्यों नहीं की?'
'लेकिन अंकल ,इसने तो मुझ से कोई झगड़ा नहीं किया .' क्या कहते हो बेटा , मुझे अमरकांतजी ने सब कुछ बता दिया है।'
'अरे अंकल , उसे आप लड़ाई कहते हैं। फिर दूसरे गलती मेरी ही थी। मुझ से ही इसका समोसा गिर गया था। अमरकांत जी को जरूर ग़लतफ़हमी हुई होगी।' राजू ने सहज भाव से कहा।
पिंटू का जवाब सुन कर पिंटू आश्चर्य चकित रह गया।
उसी शाम को जब राजू बाजार में घूम रहा था ,उसकी नजर पिंटू पर पड़ी। पिंटू ने भी राजू को देखा। यद्यपि पिंटू सुबह की घटना से राजू से प्रभावित तो था, पर इतनी आसानी से किसी के आगे झुकना उसकी शान के खिलाफ था।
घूमता राजू पिंटू के पास से निकलने लगा, तो राजू ने उसके चेहरे पर नजर डाली। इस पर पिंटू मुंह फुला कर दूसरी ओर देखने लगा। पहले तो राजू सीधा जाने लगा, पर न जाने क्या सोच कर पलटा और पिंटू से बोला,' लगता है तुम मुझसे नाराज हो ?'
' क्या मतलब ?' पिंटू ऐंठते हुए बोला।
'दरअसल मैं यहाँ के लिए नया हूं। तुम यह भी जानते हो कि यहां मेरा कोई साथी भी नहीं है। क्या हम दोनों मित्र नहीं बन सकते?' राजू ने यह बात बड़े ही सरल भाव से कही।
राजू की यह बात सुन कर पिंटू की त्यौरियां कुछ कम हुईं। उसने राजू के चेहरे को अविश्वास के साथ देखा। लेकि बोला कुछ भी नहीं।
'क्या सोच रहे हो? ठीक है, शायद तुम मुझे अपना मित्र बनाने के काबिल नहीं समझते।' यह कहकर राजू चलने लगा।
तब पिंटू ने उसे रोकते हुए कहा,' नहीं ऐसा नहीं, पर कल जो मैंने तुम्हारे साथ किया, उसके बाद भी मुझ से दोस्ती करना चाहते हो!
'अरे छोड़ो भी। इस तरह की छेड़छाड़ होती ही रहती है।' राजू बोला।
राजू की यह बात सुन कर पिंटू मुस्कुरा पड़ा और आगे बढ़ कर दोस्ती का हाथ मिलाया।
'तो फिर इस नई दोस्ती पर मोटू हलवाई के समोसे हो जाएं। ' पिंटू ने प्रस्ताव रखा।
'हां हां क्यों नहीं !
पिंटू ने पैसे देने के लिए दस रूपये का नोट निकाला, जिसे देख कर राजू को कुछ अश्चर्य हुआ।
समोसे खा कर दोनों मंदिर वाले पार्क की ओर बढ़ गए। रास्ते में राजू ने पूछा, ' पिंटू, क्या तुम्हारे पिताजी इतना सारा जेब खर्च देते हैं ?'
'शायद तुम मेरे पास दस रूपये का नोट देख कर कह रहे हो? अभी तो दोस्त तुमने एक ही नोट की झलक देखी है।' तभी उसने जेब में हाथ डालकर दस दस के कुछ नोट और दिखाए ,'क्यों केसी रही!'
राजू ने इस बार और भी आश्चर्य के साथ पूछा, ' तो क्या यह तुम्हें घर से मिलते हैं?'
'अरे घर पर कौन देगा! मैं तो हाथ की सफाई से प्राप्त करता हूं।' यह कह कर पिंटू ने गर्व के साथ राजू को देखा। 'यानि कि तुम चोरी कर के लाते
हो।' राजू बोला।
'भई तुम इसे कुछ भी कहो। मैं तो इसे हाथ की सफाई के नाम से पुकारता हूं।'
'तो तुम्हारी तरह दोस्त भी मौज उठाने के लिए घर से चोरी करके रुपये लाते होंगे ?' राजू ने पूछ।
'अरे वे कहाँ से लाएंगे !उन्हें तो मैं मौज कराता हूं। 'पिंटू अकड़ कर बोला। 'अगर आज से तुम उन्हें पैसे चटाने बंद कर दो, तब भी वह तुम्हारा साथ निभाएंगे?' राजू ने शंका जाहिर की।
क्यों नहीं, हम सब बड़े पक्के मित्र हैँ।
राजू हंसने लगा।
उसको हंसता देख पिंटू बोला ,' क्यों क्या बात हुई ?' 'कुछ नहीं, मुझे लगता है कि तुम्हारे ये दोस्त केवल पैसों के यार हैं।'
'नहीं मैं नहीं मानता।' पिंटू ने विरोध किया।
इस तरह विरोध करने से कोई बात नहीं बनती। तुम ऐसा करो कि कल से ही अपने मित्रों को चाट पकौड़ी खिलाना तथा नौटंकी दिखाना बंद कर दो। फिर पता चलेगा कि वे तुम्हारे सच्चे मित्र हैं या केवल तुम्हारे रुपयों के लिए मित्र बने हुए हैं। कुछ सोच कर पिंटू ने यह सलाह मान ली और दोनों अपने अपने घर चले गए।
इस तरह राजू और पिंटू की दोस्ती अब आगे बढ़ चली। दोनों ही रोज साथ साथ घूमने जाने लगे। लेकिन राजू देख रहा था कि पिंटू कुछ कुछ परेशान दिखाई देने लगा है। एक रोज राजू ने उससे उसकी परेशानी पूछ ही ली। पहले पिंटू ने टालना चाहा, पर राजू के अधिक आग्रह पर उसने बतला ही दी।
'क्या बतलाऊँ राजू भैया, तुम ठीक ही कहते थे। मेरे सारे दोस्त पैसे के ही यार थे। अब मुझ से कतराने लगे हैं, क्योकि मैंने पैसा चटाना बंद कर दिया है।
राजू पिंटू की बात सुन मन ही मन मुस्कुरा रहा था। उसका तीर निशाने पर लगा था. थोड़ा गंभीर होकर बोला, 'अच्छा पिंटू भाई, अब तो तुम्हें अपने दोस्तों की असलियत का पता चल गया। इसके आलावा उनमें या तो कोई व्यापारी का लड़का है या दुकानदार का। वे यदि नहीं भी
पढ़ें, तब भी दुकान पर बैठ कर चार पैसे कमा लेंगे, लेकिन तुम तो इनमें से किसी के लड़के नहीं। यदि पढ़े नहीं तो कोई चपरासी की नौकरी भी नहीं देगा।
राजू की बात सुन कर पिंटू गंभीर हो गया। राजू का जादू तो पहले ही उस पर चल चुका था, पर इस हादसे से वह और भी राजू का गुलाम हो गया।
'तुम ठीक ही कहते हो, पिताजी की सही बातें मुझे खराब लगती थीं, पर तुमने मेरी ऑंखें खोल दीं। अब मैं सब बेकार की बातें छोड़कर पढ़ाई में मन लगाऊंगा। ' पिंटू बोला।
' यह हुई न बात, चलो इसी बात पर हो जाएं समोसे।' राजू किलकते हुए बोला।'
हां हां क्यों नहीं ! पर भाई पैसे मैं दूंगा।' पिंटू बोला।
'अभी नहीं'. राजू बोला।
'फिर कब?' पिंटू ने पूछा। 'जब अपनी ईमानदारी के जेब खर्च से खिलाओगे' राजू ने कहा।
पिंटू कुछ झेंप गया।
उसी रात को राजू के नाना का तार आया जिसमें राजू के पिता जी की बीमारी का जिक्र था और राजू को वापस लौटने के लिए लिखा था।
अगले दिन शाम को गाड़ी जाती थी। राजू को उसीसे भेजने का
निर्णय हुआ। सुबह ही जब राजू ने पिंटू से अपने पिता जी के अचानक बीमारी के कारण लौटने की बात कही तो पिंटू का चेहरा उत्तर गया. 'क्यों क्या हुआ?' राजू ने पूछा. 'कुछ नहीं.' लेकिन उसी के साथ उसकी आँखों में आंसू तैर गए।
'ये आंसूं क्यों?' राजू ने आश्चर्य से पूछा।
'तुम ही बताओ, अब मैं किस के साथ खेलूँगा'. पिंटू ने बड़े भोलेपन से पूछा। 'बस इतनी सी बात है। अरे, अब तुम पहले वाले पिंटू नहीं रहे? अच्छे लोगों के मित्र बनते देर थोड़े ही लगती है।' शाम को जब राजू जाने को हुआ तब पिंटू अपनी आंखों में आंसू लिए उसके पास खड़ा था। पिंटू के मां बाप भी राजू को धन्यवाद देने आए थे। यह देख राजू के नाना नानी की गर्दन गर्व से ऊँची हो रही थी।
तांगा आ चुका था। पिंटू ने राजू से कहा ,'मुझे भूलोगे तो नहीं?'
' कैसी बात करते हो! मित्रता याद रखने के लिए होती है न कि भुलाने के लिए.
तुम मुझे चिट्ठी लिखना, मैं भी तुम्हें चिट्ठी लिखूंगा।
'हां, पिंटू ने कहा।
तभी राजू के नाना बोले, 'बेटा जल्दी करो ,नहीं तो गाड़ी छूट जाएगी। 'इसी के साथ तांगा आगे बढ़ गया।
-विनोद हर्ष
राजू अपनी नानी से मिलने गांव आया था। रात को जब वह सोने लगा उसके कानों में किसी के ऊँचे स्वर में बोलने की धमकी भरी आवाज पड़ी। फिर थोड़ी देर बाद उसे किसी के रोने चिल्लाने की आवाज भी सुनाई दी। उसने नानी से पूछा ,'नानी ,यह आवाज कैसी आ रही है ?' शायद कोई किसी बच्चे को पीट रहा है।'
'यह आवाज ! अरे हमारे वर्मा अपने लड़के पिंटू की धुनाई कर रहे होंगे।'
धुनाई ! लेकिन क्यों?' राजू ऐसे चौंकते हुए बोला जैसे नानी ने कोई अनोखी बात कह दी हो।
'बात यह है कि पिंटू बुरी संगत में पड़कर बिगड़ गया है। पढ़ने का नाम ही नहीं लेता। मोहल्ले वालों से रोज रोज झगड़े मोल लेता रहता है। साथ में वह छोटी मोटी चोरी भी करने लगा है। अब तू ही बता ऐसे बेटे को कोई पीटे नहीं तो क्या करे।' नानी ने समझाया।
अगली सुबह राजू अपने घर के बाहर खड़ा था कि पड़ोस के लड़के ने जानबूझ के अड़ंगी लगा कर उसे गिरा दिया। राजू को बहुत आश्चर्य हुआ। उस ने उठते हुए कहा, 'मैंने तो तुम्हें कुछ नहीं कहा, फिर तुमने ऐसा क्यों किया?'
'अबे चल ! क्या 'तू मझे घूर नहीं रहा था?' पिंटू ने उस पर आरोप लगाया। तभी सामने से अपने पिताजी को आते देख वह चुपचाप खिसक गया। शाम को राजू एक हलवाई की दुकान पर खड़ा था कि इसी बीच पिंटू भी अपने दलबल सहित वहीँ आकर खड़ा हो गया।
अरे मोटू , साहब को अछे समोसे देना , कहीं नया पंछी समझकर लूट ले !
एक बार राजू ने पिंटू की तरफ देखा। उसको अपनी ओर देखता पाकर पिंटू सहित सभी साथी एक ठहाका लगाकर हंस पड़े। मोटू हलवाई ने भी हंसी में साथ दिया। पर राजू अब भी चुप रहा।
तभी वहां खड़े लड़कों में से एक बोला ,' मेरा यार गूंगा लगता है। पहले तो बड़ी जबान चला रहा था।' 'पिंटू बोला ,' अछा ' इसी के साथ फिर एक बार जोरदार ठहाका लगा।
मोटू हलवाई ने राजू की तरफ समोसे बढ़ाए तो पिंटू ने बीच में ही उससे छीन लिए। इस पर राजू को क्रोध आ गया और उसने पलट कर पिंटू को जोरदार झापड़ दिया। अचानक झापड़ से एक बार तो पिंटू और उसके साथी स्तंभित रह गए ,पर अगले ही क्षण पिंटू राजू से उलझ गया। पिंटू ने समझा था कि वह उसे गिरा ही देगा। पर यह उसकी भूल थी। कुछ ही देर में राजू पिंटू पर भारी पड़ने लगा। लेकिन उनको इस तरह लड़ता देख वहां के कुछ लोगों ने आगे बढ़ कर दोनों को छुड़ा दिया।
अगले दिन राजू को पिंटू के पिताजी को पिंटू के साथ घर में घुसते हुए देखा तो उसका माथा ठनका। वर्मा जी ने राजू को बुलवाया और पूछा ,'बेटा, कल बड़े बाजार में पिंटू ने तुमसे झगड़ा किया था. तुमने मुझसे शिकायत क्यों नहीं की?'
'लेकिन अंकल ,इसने तो मुझ से कोई झगड़ा नहीं किया .' क्या कहते हो बेटा , मुझे अमरकांतजी ने सब कुछ बता दिया है।'
'अरे अंकल , उसे आप लड़ाई कहते हैं। फिर दूसरे गलती मेरी ही थी। मुझ से ही इसका समोसा गिर गया था। अमरकांत जी को जरूर ग़लतफ़हमी हुई होगी।' राजू ने सहज भाव से कहा।
पिंटू का जवाब सुन कर पिंटू आश्चर्य चकित रह गया।
उसी शाम को जब राजू बाजार में घूम रहा था ,उसकी नजर पिंटू पर पड़ी। पिंटू ने भी राजू को देखा। यद्यपि पिंटू सुबह की घटना से राजू से प्रभावित तो था, पर इतनी आसानी से किसी के आगे झुकना उसकी शान के खिलाफ था।
घूमता राजू पिंटू के पास से निकलने लगा, तो राजू ने उसके चेहरे पर नजर डाली। इस पर पिंटू मुंह फुला कर दूसरी ओर देखने लगा। पहले तो राजू सीधा जाने लगा, पर न जाने क्या सोच कर पलटा और पिंटू से बोला,' लगता है तुम मुझसे नाराज हो ?'
' क्या मतलब ?' पिंटू ऐंठते हुए बोला।
'दरअसल मैं यहाँ के लिए नया हूं। तुम यह भी जानते हो कि यहां मेरा कोई साथी भी नहीं है। क्या हम दोनों मित्र नहीं बन सकते?' राजू ने यह बात बड़े ही सरल भाव से कही।
राजू की यह बात सुन कर पिंटू की त्यौरियां कुछ कम हुईं। उसने राजू के चेहरे को अविश्वास के साथ देखा। लेकि बोला कुछ भी नहीं।
'क्या सोच रहे हो? ठीक है, शायद तुम मुझे अपना मित्र बनाने के काबिल नहीं समझते।' यह कहकर राजू चलने लगा।
तब पिंटू ने उसे रोकते हुए कहा,' नहीं ऐसा नहीं, पर कल जो मैंने तुम्हारे साथ किया, उसके बाद भी मुझ से दोस्ती करना चाहते हो!
'अरे छोड़ो भी। इस तरह की छेड़छाड़ होती ही रहती है।' राजू बोला।
राजू की यह बात सुन कर पिंटू मुस्कुरा पड़ा और आगे बढ़ कर दोस्ती का हाथ मिलाया।
'तो फिर इस नई दोस्ती पर मोटू हलवाई के समोसे हो जाएं। ' पिंटू ने प्रस्ताव रखा।
'हां हां क्यों नहीं !
पिंटू ने पैसे देने के लिए दस रूपये का नोट निकाला, जिसे देख कर राजू को कुछ अश्चर्य हुआ।
समोसे खा कर दोनों मंदिर वाले पार्क की ओर बढ़ गए। रास्ते में राजू ने पूछा, ' पिंटू, क्या तुम्हारे पिताजी इतना सारा जेब खर्च देते हैं ?'
'शायद तुम मेरे पास दस रूपये का नोट देख कर कह रहे हो? अभी तो दोस्त तुमने एक ही नोट की झलक देखी है।' तभी उसने जेब में हाथ डालकर दस दस के कुछ नोट और दिखाए ,'क्यों केसी रही!'
राजू ने इस बार और भी आश्चर्य के साथ पूछा, ' तो क्या यह तुम्हें घर से मिलते हैं?'
'अरे घर पर कौन देगा! मैं तो हाथ की सफाई से प्राप्त करता हूं।' यह कह कर पिंटू ने गर्व के साथ राजू को देखा। 'यानि कि तुम चोरी कर के लाते
हो।' राजू बोला।
'भई तुम इसे कुछ भी कहो। मैं तो इसे हाथ की सफाई के नाम से पुकारता हूं।'
'तो तुम्हारी तरह दोस्त भी मौज उठाने के लिए घर से चोरी करके रुपये लाते होंगे ?' राजू ने पूछ।
'अरे वे कहाँ से लाएंगे !उन्हें तो मैं मौज कराता हूं। 'पिंटू अकड़ कर बोला। 'अगर आज से तुम उन्हें पैसे चटाने बंद कर दो, तब भी वह तुम्हारा साथ निभाएंगे?' राजू ने शंका जाहिर की।
क्यों नहीं, हम सब बड़े पक्के मित्र हैँ।
राजू हंसने लगा।
उसको हंसता देख पिंटू बोला ,' क्यों क्या बात हुई ?' 'कुछ नहीं, मुझे लगता है कि तुम्हारे ये दोस्त केवल पैसों के यार हैं।'
'नहीं मैं नहीं मानता।' पिंटू ने विरोध किया।
इस तरह विरोध करने से कोई बात नहीं बनती। तुम ऐसा करो कि कल से ही अपने मित्रों को चाट पकौड़ी खिलाना तथा नौटंकी दिखाना बंद कर दो। फिर पता चलेगा कि वे तुम्हारे सच्चे मित्र हैं या केवल तुम्हारे रुपयों के लिए मित्र बने हुए हैं। कुछ सोच कर पिंटू ने यह सलाह मान ली और दोनों अपने अपने घर चले गए।
इस तरह राजू और पिंटू की दोस्ती अब आगे बढ़ चली। दोनों ही रोज साथ साथ घूमने जाने लगे। लेकिन राजू देख रहा था कि पिंटू कुछ कुछ परेशान दिखाई देने लगा है। एक रोज राजू ने उससे उसकी परेशानी पूछ ही ली। पहले पिंटू ने टालना चाहा, पर राजू के अधिक आग्रह पर उसने बतला ही दी।
'क्या बतलाऊँ राजू भैया, तुम ठीक ही कहते थे। मेरे सारे दोस्त पैसे के ही यार थे। अब मुझ से कतराने लगे हैं, क्योकि मैंने पैसा चटाना बंद कर दिया है।
राजू पिंटू की बात सुन मन ही मन मुस्कुरा रहा था। उसका तीर निशाने पर लगा था. थोड़ा गंभीर होकर बोला, 'अच्छा पिंटू भाई, अब तो तुम्हें अपने दोस्तों की असलियत का पता चल गया। इसके आलावा उनमें या तो कोई व्यापारी का लड़का है या दुकानदार का। वे यदि नहीं भी
पढ़ें, तब भी दुकान पर बैठ कर चार पैसे कमा लेंगे, लेकिन तुम तो इनमें से किसी के लड़के नहीं। यदि पढ़े नहीं तो कोई चपरासी की नौकरी भी नहीं देगा।
राजू की बात सुन कर पिंटू गंभीर हो गया। राजू का जादू तो पहले ही उस पर चल चुका था, पर इस हादसे से वह और भी राजू का गुलाम हो गया।
'तुम ठीक ही कहते हो, पिताजी की सही बातें मुझे खराब लगती थीं, पर तुमने मेरी ऑंखें खोल दीं। अब मैं सब बेकार की बातें छोड़कर पढ़ाई में मन लगाऊंगा। ' पिंटू बोला।
' यह हुई न बात, चलो इसी बात पर हो जाएं समोसे।' राजू किलकते हुए बोला।'
हां हां क्यों नहीं ! पर भाई पैसे मैं दूंगा।' पिंटू बोला।
'अभी नहीं'. राजू बोला।
'फिर कब?' पिंटू ने पूछा। 'जब अपनी ईमानदारी के जेब खर्च से खिलाओगे' राजू ने कहा।
पिंटू कुछ झेंप गया।
उसी रात को राजू के नाना का तार आया जिसमें राजू के पिता जी की बीमारी का जिक्र था और राजू को वापस लौटने के लिए लिखा था।
अगले दिन शाम को गाड़ी जाती थी। राजू को उसीसे भेजने का
निर्णय हुआ। सुबह ही जब राजू ने पिंटू से अपने पिता जी के अचानक बीमारी के कारण लौटने की बात कही तो पिंटू का चेहरा उत्तर गया. 'क्यों क्या हुआ?' राजू ने पूछा. 'कुछ नहीं.' लेकिन उसी के साथ उसकी आँखों में आंसू तैर गए।
'ये आंसूं क्यों?' राजू ने आश्चर्य से पूछा।
'तुम ही बताओ, अब मैं किस के साथ खेलूँगा'. पिंटू ने बड़े भोलेपन से पूछा। 'बस इतनी सी बात है। अरे, अब तुम पहले वाले पिंटू नहीं रहे? अच्छे लोगों के मित्र बनते देर थोड़े ही लगती है।' शाम को जब राजू जाने को हुआ तब पिंटू अपनी आंखों में आंसू लिए उसके पास खड़ा था। पिंटू के मां बाप भी राजू को धन्यवाद देने आए थे। यह देख राजू के नाना नानी की गर्दन गर्व से ऊँची हो रही थी।
तांगा आ चुका था। पिंटू ने राजू से कहा ,'मुझे भूलोगे तो नहीं?'
' कैसी बात करते हो! मित्रता याद रखने के लिए होती है न कि भुलाने के लिए.
तुम मुझे चिट्ठी लिखना, मैं भी तुम्हें चिट्ठी लिखूंगा।
'हां, पिंटू ने कहा।
तभी राजू के नाना बोले, 'बेटा जल्दी करो ,नहीं तो गाड़ी छूट जाएगी। 'इसी के साथ तांगा आगे बढ़ गया।
-विनोद हर्ष
No comments:
Post a Comment