प्यार दो प्यार लो
जगत पुर कस्बे में एक बड़ा पार्क था, जो चारों तरफ से बड़े बड़े पेड़ पौधों से घिरा हुआ था। उन पेड़ों पर अनेक पक्षियों ने अपने घोंसले बना रखे थे। सुबह सुबह पार्क में घूमने वालों की भीड़ रहती थी । पक्षी भी उड़ान भर कर किल्लोल करते रहते थे, जिस से पार्क का वातावरण बड़ा ही रमणीक बना रहता।
कुछ दिनों से उस पार्क में एक भिखारी आकर बैठने लगा था । उसे जो कुछ भीख में मिलता उसमें से कुछ हिस्सा वह पक्षियों को डाल देता। पक्षी उसके फैंके खाने को चुग तो लेते , पर उनके मन में यह भय बना रहता कि कहीं यह बहेलिया न हो जो हमें इस तरहं का लालच दे कर अपने जाल में फंसा ले। इसलिए वे उसका डाला हुआ खाना बड़ी सावधानी के साथ चुगते।
भिखारी अक्सर वहीँ पार्क में सो कर रात बिताता। जब कई महीनें बीत गए और उस भिखारी ने उनको कोई हानी नहीं पहुंचाई तो अब वे उसके आसपास भी मंडराने लगे। भिखारी भी उन्हें अपने पास पाकर उनको पुचकारता और प्यार करता। इस तरह अब वे एक दूसरे से हिलमिल गए थे।
एक दिन की घटना है कि कलगी नाम का मोर उडान भरते हुए पेड़ की एक डाली से टकरा गया और नीचे आ गिरा। जमींन पर गिरते ही मोर करहाया । भिखारी उस समय वहीँ बैठा था। वह दौड़ कर उसके पास पहुंचा और उसे अपनी गोद में लेकर सहलाने लगा। फिर झटपट जा कर पानी लेकर आया और मोर को पिलाया जिस से उस की झटपटाहट कुछ कम हुई। इस बीच दूसरे पक्षी भी वहां जमा हो गए। भिखारी ने ध्यान से जब मोर की टांग को देखा तो वह समझ गया कि इसके पैर में चोट आई है। इसके बाद उसने अपने अंगोछे को फाड़ कर धीरे से उसके पैरों में लपेट दिया।
शाम को भिखारी अपने साथ कुछ पट्टी और दवाई लेकर आया। चार पांच दिन के उपचार के बाद मोर बिलकुल ठीक हो गया।
सर्दी का मौसम था। उस रात सर्दी कुछ ज्यादा ही थी। भिखारी अपने फटे कम्बल को लपेटे वहीँ पार्क में एक बेंच पर सोया पड़ा था। रात को उसे लगा कि वह बुखार में तप रहा है। सारी रात वह बुखार में पड़ा रहा। सुबह जब उसने उठने की कोशिश की तो वह वहीँ लुढ़क गया। यह देख पक्षी घबरा गए। सारे इकट्ठे हो कर इस बात पर विचार करने लगे कि उसकी मदद कैसे की जाए।
बिट्टू बटेर बोला ,' लगता है इसे कोई बड़ी बीमारी हो गई है, डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा।'
'पर हम इसे वहां तक लेकर कैसे जाएंगे?' मिट्ठू तोता बोला।
इस पर मिनी गोरैया बोली ,' क्यों न हम डॉक्टर को यहाँ बुला लाएं?'
'बात तो ठीक है ,पर हम तो किसी डॉक्टर को जानते नहीं !' सुरीली मैना बोली।
इस पर लोटन कबूतर ने कहा ,' इसकी फ़िक्र मत करो। मैं एक डॉक्टर को जानता हूं। कुछ समय पहले मैं और गुटकी उसके क्लिनिक में घोंसला बना कर रहे थे। '
'पर उसे हम समझायेंगे कैसे? हम तो आदमियों की भाषा जानते नहीं।' वहां लटकी सुरीली कोयल ने शंका जाहिर की तो चंचल मैंना बोल पड़ी ,' इसकी फ़िक्र छोड़ो। मैं कई साल एक आदमी के पिंजरे में कैद रही हूं। आदमी की भाषा मैं बड़ी आसानी से बोल लेती हूं।'
यह सुन कर सभी के चेहरे खिल उठे।
लोटन कबूतर उन्हें लेकर डॉक्टर के क्लिनिक पहुंचा। क्लिनिक पर अभी मरीजों की भीड़ लगी थी। जब मरीज छंट गए तो मैना और लोटन कबूतर डॉक्टर की टेबल पर जा बैठे। पक्षियों को देख डॉक्टर घबरा गया।
घबराओ नहीं डॉक्टर साहब हम यहां इसलिए आए हैं कि हमारा एक दोस्त बीमार पड़ गया है। आपको चल कर उसका उपचार करना है।
उस पक्षी को मनुष्य की आवाज में बोलता देख डॉक्टर हैरान था। पहले तो उसके मुह से कोई शब्द नहीं निकला, फिर हकलाते हुए बोला ,' तो मेरे पास क्यों आए हो ,किसी पक्षियों के डॉक्टर के पास जाओ। ' डॉक्टर बोला।
'हमारा मरीज पक्षी नहीं आदमी है और वह बड़े पार्क में पड़ा है। मैना का उत्तर सुनकर डॉक्टर को आश्चर्य हुआ। जब मैना ने बार बार अनुरोध किया तो डॉक्टर अपना बैग उठाकर चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
यह देख खिड़की में लटके साथी ख़ुशी से झूम उठे।
मैना डॉक्टर की गाड़ी के आगे उड़कर रास्ता दिखा रही थी।
पार्क में पहुंच कर डॉक्टर ने भिखारी की अच्छी तरह जाँच की। वह मन ही मन बुदबुदाया इसे निमोनिया है। तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा। तभी उसने मोबाइल पर किसी को फोन किया। फिर उसने भिखारी को एक इंजेक्शन लगाया।
यह सब वहां जमा पक्षी बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। तभी उन्होंने देखा एक गाड़ी वहां आकर रुकी। यह ऐंम्बुलेंस थी। उस में से सफ़ेद वर्दी पहने दो आदमी उतरे और भिखारी को उसमें डाल कर ले गए। वे उसे लेकर सिटी अस्पताल पहुंचे जहाँ उसका इलाज होना था। कुछ पक्षी भी एम्बुलेंस के साथ उड़ते हुए अस्पताल पहुंचे।
पंद्रह दिन बाद भिखारी को अस्पताल से छुट्टी मिली। भिखारी जाने लगा तो डॉक्टर ने उसे बताया कि उसके पक्षी मित्रों ने उसकी जान बचाई है। फिर डॉक्टर ने विस्तार से उसे सारी बात बताई।
पार्क में पहुँच कर उसने सभी पक्षी मित्रों का आभार व्यक्त किया । भिखारी को वहां आया देख सभी पक्षी उड़ उड़ कर ख़ुशी जाहिर करने लगे।
-विनोद हर्ष
जगत पुर कस्बे में एक बड़ा पार्क था, जो चारों तरफ से बड़े बड़े पेड़ पौधों से घिरा हुआ था। उन पेड़ों पर अनेक पक्षियों ने अपने घोंसले बना रखे थे। सुबह सुबह पार्क में घूमने वालों की भीड़ रहती थी । पक्षी भी उड़ान भर कर किल्लोल करते रहते थे, जिस से पार्क का वातावरण बड़ा ही रमणीक बना रहता।
कुछ दिनों से उस पार्क में एक भिखारी आकर बैठने लगा था । उसे जो कुछ भीख में मिलता उसमें से कुछ हिस्सा वह पक्षियों को डाल देता। पक्षी उसके फैंके खाने को चुग तो लेते , पर उनके मन में यह भय बना रहता कि कहीं यह बहेलिया न हो जो हमें इस तरहं का लालच दे कर अपने जाल में फंसा ले। इसलिए वे उसका डाला हुआ खाना बड़ी सावधानी के साथ चुगते।
भिखारी अक्सर वहीँ पार्क में सो कर रात बिताता। जब कई महीनें बीत गए और उस भिखारी ने उनको कोई हानी नहीं पहुंचाई तो अब वे उसके आसपास भी मंडराने लगे। भिखारी भी उन्हें अपने पास पाकर उनको पुचकारता और प्यार करता। इस तरह अब वे एक दूसरे से हिलमिल गए थे।
एक दिन की घटना है कि कलगी नाम का मोर उडान भरते हुए पेड़ की एक डाली से टकरा गया और नीचे आ गिरा। जमींन पर गिरते ही मोर करहाया । भिखारी उस समय वहीँ बैठा था। वह दौड़ कर उसके पास पहुंचा और उसे अपनी गोद में लेकर सहलाने लगा। फिर झटपट जा कर पानी लेकर आया और मोर को पिलाया जिस से उस की झटपटाहट कुछ कम हुई। इस बीच दूसरे पक्षी भी वहां जमा हो गए। भिखारी ने ध्यान से जब मोर की टांग को देखा तो वह समझ गया कि इसके पैर में चोट आई है। इसके बाद उसने अपने अंगोछे को फाड़ कर धीरे से उसके पैरों में लपेट दिया।
शाम को भिखारी अपने साथ कुछ पट्टी और दवाई लेकर आया। चार पांच दिन के उपचार के बाद मोर बिलकुल ठीक हो गया।
सर्दी का मौसम था। उस रात सर्दी कुछ ज्यादा ही थी। भिखारी अपने फटे कम्बल को लपेटे वहीँ पार्क में एक बेंच पर सोया पड़ा था। रात को उसे लगा कि वह बुखार में तप रहा है। सारी रात वह बुखार में पड़ा रहा। सुबह जब उसने उठने की कोशिश की तो वह वहीँ लुढ़क गया। यह देख पक्षी घबरा गए। सारे इकट्ठे हो कर इस बात पर विचार करने लगे कि उसकी मदद कैसे की जाए।
बिट्टू बटेर बोला ,' लगता है इसे कोई बड़ी बीमारी हो गई है, डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा।'
'पर हम इसे वहां तक लेकर कैसे जाएंगे?' मिट्ठू तोता बोला।
इस पर मिनी गोरैया बोली ,' क्यों न हम डॉक्टर को यहाँ बुला लाएं?'
'बात तो ठीक है ,पर हम तो किसी डॉक्टर को जानते नहीं !' सुरीली मैना बोली।
इस पर लोटन कबूतर ने कहा ,' इसकी फ़िक्र मत करो। मैं एक डॉक्टर को जानता हूं। कुछ समय पहले मैं और गुटकी उसके क्लिनिक में घोंसला बना कर रहे थे। '
'पर उसे हम समझायेंगे कैसे? हम तो आदमियों की भाषा जानते नहीं।' वहां लटकी सुरीली कोयल ने शंका जाहिर की तो चंचल मैंना बोल पड़ी ,' इसकी फ़िक्र छोड़ो। मैं कई साल एक आदमी के पिंजरे में कैद रही हूं। आदमी की भाषा मैं बड़ी आसानी से बोल लेती हूं।'
यह सुन कर सभी के चेहरे खिल उठे।
लोटन कबूतर उन्हें लेकर डॉक्टर के क्लिनिक पहुंचा। क्लिनिक पर अभी मरीजों की भीड़ लगी थी। जब मरीज छंट गए तो मैना और लोटन कबूतर डॉक्टर की टेबल पर जा बैठे। पक्षियों को देख डॉक्टर घबरा गया।
घबराओ नहीं डॉक्टर साहब हम यहां इसलिए आए हैं कि हमारा एक दोस्त बीमार पड़ गया है। आपको चल कर उसका उपचार करना है।
उस पक्षी को मनुष्य की आवाज में बोलता देख डॉक्टर हैरान था। पहले तो उसके मुह से कोई शब्द नहीं निकला, फिर हकलाते हुए बोला ,' तो मेरे पास क्यों आए हो ,किसी पक्षियों के डॉक्टर के पास जाओ। ' डॉक्टर बोला।
'हमारा मरीज पक्षी नहीं आदमी है और वह बड़े पार्क में पड़ा है। मैना का उत्तर सुनकर डॉक्टर को आश्चर्य हुआ। जब मैना ने बार बार अनुरोध किया तो डॉक्टर अपना बैग उठाकर चलने के लिए उठ खड़ा हुआ।
यह देख खिड़की में लटके साथी ख़ुशी से झूम उठे।
मैना डॉक्टर की गाड़ी के आगे उड़कर रास्ता दिखा रही थी।
पार्क में पहुंच कर डॉक्टर ने भिखारी की अच्छी तरह जाँच की। वह मन ही मन बुदबुदाया इसे निमोनिया है। तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा। तभी उसने मोबाइल पर किसी को फोन किया। फिर उसने भिखारी को एक इंजेक्शन लगाया।
यह सब वहां जमा पक्षी बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। तभी उन्होंने देखा एक गाड़ी वहां आकर रुकी। यह ऐंम्बुलेंस थी। उस में से सफ़ेद वर्दी पहने दो आदमी उतरे और भिखारी को उसमें डाल कर ले गए। वे उसे लेकर सिटी अस्पताल पहुंचे जहाँ उसका इलाज होना था। कुछ पक्षी भी एम्बुलेंस के साथ उड़ते हुए अस्पताल पहुंचे।
पंद्रह दिन बाद भिखारी को अस्पताल से छुट्टी मिली। भिखारी जाने लगा तो डॉक्टर ने उसे बताया कि उसके पक्षी मित्रों ने उसकी जान बचाई है। फिर डॉक्टर ने विस्तार से उसे सारी बात बताई।
पार्क में पहुँच कर उसने सभी पक्षी मित्रों का आभार व्यक्त किया । भिखारी को वहां आया देख सभी पक्षी उड़ उड़ कर ख़ुशी जाहिर करने लगे।
-विनोद हर्ष
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