Sunday, 31 July 2016

Indian Mytholgical Story : Rani Madyanti ke kundal

                                                                 
                                                                                 रानी मदयन्ती के  कुंडल

महर्षि गौतम के अनेक शिष्य थे।  उनमें से एक थे उत्तंग।  उत्तंग  बड़े ही गुरुभक्त थे.
महर्षि गौतम का भी उन पर खास स्नेह था।  हज़ारों शिष्य  अपनी शिक्षा पूरी करके घर  लौट  गए, पर महर्षि गौतम ने उत्तंग को घर  लौटने की आज्ञा नहीं दी।
उत्तंग को गुरु की सेवा करते हुए सौ वर्ष हो गए थे। एक दिन अचानक उन्होंने  अपनी सफ़ेद जटाएं देखीं , तब उन्हें अपने बूढ़े.  होने का  आभास हुआ।  यह देख कर वह बहुत  उदास हो गए।
उत्तंग को इस तरह अचानक उदास देख कर महर्षि गौतम ने इसका काऱण  पूछा, तो उत्तंग ने बहुत दुखी मन से कहा ,' गुरुदेव , मेरा मन हमेशा आप ही में लगा रहा। मैंने आपकी सेवा करने के अलावा  कुछ भी नहीं सोचा।  यहाँ तक कि  मुझे यह  भी पता नहीं चला  कि   मैं कब  बूढा   हो गया।  आपने  सभी शिष्यों को घर जाने की आज्ञा  दी लेकिन मुझे नहीं दी।'
उत्तंग के उदास रहने का काऱण जानकर   महर्षि  गौतम  गंभीर  हो गए, बोले, " प्रिय  शिष्य , तुम्हारी गुरुभक्ति देखकर तुम पर मेरा स्नेह अधिक हो गया  था।  तुम्हें घर लौट जाने की आज्ञा देने का ख्याल ही मुझे नहीं रहा।  पर अब मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ  की तुम अपने घर जाओ।'
गुरु की आज्ञा सुनकर  उत्तंग बहुत प्रसन्न हुए।  उन्होंने हाथ जोड़.कर  पूछा ,' भगवन, जाने से पहले मुझे आज्ञा करें  कि  मैं आपको गुरुदक्षिणा मैं क्या दूँ ?'
वत्स, तुमने जो मेरी सेवा की है , मैं उससे बहुत प्रसन्न हूँ।  यही मेरी गुरूदक्षिणा है। महर्षि गौतम ने गदगद होकर  कहा।
तब उत्तग ने अपना शरीर युवावस्था में बदल लिया।  फिर वह गुरु आज्ञा लेकर गुरु पत्नी के पास पहुंचे और बोले ,'माताजी मैं  घर लौट रहा हूँ।  जाने से पहले आपको गुरुदक्षिणा   देना चाहता हूँ। आप आज्ञा करें क्या दूँ ?'
गुरु पत्नी  अहिल्या बोलीं ,' .बेटा , मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत संतुष्ट हूँ, यही मेरे लिए पर्याप्त दक्षिणा है.
लेकिन उत्तंग इस बात से सन्तुष्ट नहीं हुए। उन्होंने गुरुदक्षिणा  देने का  बार बार  आग्रह किया , तो अहिल्या  बोलीं  ,'जब तुम गुरुदक्षिणा देने का इतना आग्रह करते  हो तो  राजा सौदास की रानी  मदयन्ती के कानों में पड़े  माणिक्य  कुंडल मुझे  लाकर दो।'
.'बहुत  अच्छा। ' कहकर वह गुरु पत्नी की आज्ञा पूरी करने चल पड़े।
कई रोज बराबर चलने के बाद  उत्तंग राजा सौदास के यहाँ पहुंचे।  राजा सौदास का  हुलिया देख कर उत्तंग  चोंक  पड़े। राजा सौदास   की लंबी लंबी दाढ़ी मूंछ थीं।  उसका सारा शरीर मनुष्य  के रक्त से सना हुआ था । वह सब इसलिए था की राजा सौदास ब्राह्मणों के  शाप  से नरभक्षी हो गये  थे।
अपने सामने जब सौदास ने उत्तंग को देखा तो वह खिलखिलाकर बोला , ' वाह ! आप खुद ही चले आए ! मैं इस समय आहार की खोज में था। '
सौदास की यह  बात सुनकर भी  उत्तंग डरे नहीं , बल्कि हाथ जोड़ कर बोले ,' राजन ,जिस वस्तु  को मैं दक्षिणा के रूप में  अपने गुरु को देना चाहता हूँ ,वह आपके पास है। आप मुझे वह वस्तु दे दें ,मैं वायदा करता हूँ कि गुरुदक्षिणा देने के बाद खुद ही आपके पास लौट आऊंगा। फिर आप चाहें तो मुझे अपना आहार बना लें। '
राजा सौदास ने कुछ देर सोचा।  फिर बोला,' अगर ऐसी बात है तो बोलो वह क्या चीज है,  मैं देने को तैयार हूँ। '
' राजन ,मुझे आपकी पत्नी के माणिक्य कुंडल  चाहिएं । ' उत्तंग ने कहा।
यह सुनकर पहले तो  सौदास कुछ  विचलित हए, पर वचन दे चुके थे इसलिए उन्होंने अपनी रानी से कुंडल ला कर उत्तंग  को दे दिए।
उत्तंग उन  कुंडलों  को पाकर बहुत खुश हुए।  उन्होंने कुंडल अपनी मृगछाला   में  लपेट लिए ताकि कहीं गिर न जाएं । वापस लौटते समय उन्हें भूख सताने लगी।  रास्ते  में एक पेड़ पर उनकी नजर पड़ी।  वह पेड़ बेल के फलों से लदा  हुआ था। उन्होंने अपनी मृगछाला को उसी पेड़ की एक डाल  में बांध दिया और खुद उस पेड़ पर चढ़कर  फल तोड़ने लगे।  लेकिन फल गिरते समय उस डाल  से टकराते जिस पर मृगछाला बांधी  थी।  फलों के टकराने से मृगछाला  का बंधन खुल गया और वह कुंडल समेत ज़मीन  पर जा  गिरी।  जिस जगह वे कुंडल गिरे, वहीँ पास ही ऐरावत कुल का  एक सांप कुंडली मारे  बैठा था।  उसकी नजर उन कुण्डलों पर पड़ी तो वह उन्हें मुह में दबाकर पास ही के बिल में घुस गया।
जैसे ही सांप ने वे कुंडल उठाये वैसे ही उत्तंग की नजर उस पर पड़ गयी।  वह गुस्से में भर कर पेड़ से कूद पड़े , पर तब तक तो सांप  बिल में गायब हो चुका  था।
उत्तंग ने फ़ौरन वहीँ पास में पड़ी एक लकड़ी उठाकर उस बिल  को खोदना शुरू कर दिया। लेकिन काफी दिन खोदने  के बावजूद भी वह सांप को नहीं ढूढ़  पाए।
उत्तंग के इस धैर्य और लगन को पास रह रहे एक ब्राह्मण ने देखा , तो एक दिन उसने उत्तंग के पास आकर कहा ,' ब्राह्मण ! जिस सांप की खोज में तुम हो वह तो  नागलोक में पहुंच  चुका है।  वहां तक पहुंचना  इतना आसान नहीं है., क्योंकि नागलोक यहां से हजारों योजन  दूर है!'
' लेकिन मुनिवर ,मुझे कितना भी परिश्रम  क्यों न करना पड़े ,मैं वहां पर पहुँच कर ही रहूँगा। ' उत्तंग ने कहा।
उत्तंग के जवाब से ब्राह्मण बहुत खुश  हुए और उन्होंने उत्तंग की लकड़ी पर एक मंत्र  फूंका जिससे लकड़ी के अगले वार से ही नागलोक का मार्ग बन गया.।
उस मार्ग से उत्तंग नागलोक पहुंच गए। वहां की भव्यता और विशालता देख कर उत्तंग  हैरत  में  पड़  गए। वहां चारों  तरफ रत्न और माणिक्य आभूषण थे।  उत्तंग सोचने लगे कि वह अपने कुण्डलों को कैसे ढूढ़ें। अभी यह बात सोच ही रहे थे कि वहां एक घोड़ा  आकर रुका। उस घोड़े का रूप रंग बड़ा ही अजीब था। , उसने उत्तंग से कहा,' बेटा  , तुम शायद अपने माणिक्य कुंडल खोजने आए  हो। '
घोड़े की यह बात सुनकर वह चौंक  पड़े।
' चौंक  ने की कोई बात नहीं। अगर तुम मेरी पूंछ  पर फूंक  मार दो  तो तुम्हारे कुंडल तुम्हें  मिल  जाएंगे। ' घोड़ा  बोला।
उत्तंग ने  फ़ौरन ही उस घोडे की पूंछ पर फूंक  मार दी।  फूंक मारते  ही घोड़े के शरीर में अग्नि की लपटें निकलने लगीं। उन  लपटों के कारण   वहां चारों तरफ धुआं ही धुआं फ़ैल गया।
उस धुंए के कारण ऐरावत के घर में हाहाकार मच गया। नाग बुरी तरह घबरा गए। सभी नाग इकट्ठे हो कर उत्तंग के सामने आकर हाथ  जोड़ कर खड़े हो गए  और इस क्रोध का कारण पूछने लगे।
उत्तंग  ने तब अपने कुंडल लौटाने  की बात कही। ऐरावत परिवार ने फ़ौरन ही वे कुंडल वापस कर दिए
उत्तम उन कुंडलों  को लेकर सीधे आश्रम पहुंचे।  उन्होंने गुरु पत्नी को वे कुंडल गुरुदक्षिणा में दे दिए, जिन्हें पाकर   गुरु पत्नी अहिल्या उत्तंग की लगन और गुरुभक्ति पर  बेहद प्रसन्न हईं और उन्हें आशीर्वाद दिया कि वह कोई ऐसा काम करेंगे जिससे युगों तक उन्हें जाना जा सके।
यह वही उत्तंग मुनि थे जन्होंने बाद में अपनी तपस्या के बल पर मरु भूमि में वर्षा करवाई। आज भी मरू भूमि  पर  उत्तंग मेघ वर्षा करते हैं।

विनोद हर्ष

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